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RAWA RAJPUT HISTORY

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  • रवा राजपूतों का इतिहास
वर्तमान रवा समुदाय के पूर्वज १२वीं शताब्दी के दौरान मेरठ मुजफ्फरनगर क्षेत्र में शासक थे और भारत के विभिन्न हिस्सों से आए थे व विभिन्न राजपूत कुलों के थे। तराइन की दूसरी लड़ाई हारने के बाद, गोरी के सामने आत्मसमर्पण करने वाले सभी सामंत राजाओं को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया था, लेकिन तेजपाल तोमर 2 (चाहड़पाल तोमर का पुत्र) और कुछ अन्य सामंत राजाओं ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और दिल्ली की ओर दौड़े। युद्ध जीतने के बाद गोरी अजमेर की ओर चल पड़ा। तेजपाल तोमर 2 बचे हुए राजाओं के साथ 3 मार्च 1192 को दिल्ली पहुंचा और घुरीद सेना का विरोध करने और दिल्ली को बचाने की तैयारी शुरू कर दी। इस समय तक पृथ्वीराज और चाहड़पाल की हारी हुई लड़ाई और मृत्यु की खबर अजमेर तक भी पहुंच चुकी थी। चूँकि केवल तोमर चौहानों का मित्रवत राज्य रह गया था, पृथ्वीराज चौहान के बच्चों और पत्नियों को गोरी के आने से पहले ही दिल्ली भेज दिया गया होगा। दिल्ली के आसपास के राजाओं के परिवार के सदस्य भी युद्ध शुरू होने से पहले लाल कोट किले में जमा हो गए होंगे। इन सभी को कुछ बचे हुए राजाओं की देखरेख में एक ठिकाने में भेज दिया गया। चौहान राजधानी को लूट लिया गया और गोविंदराजा (गोला राजा, एक दासी के माध्यम से पृथ्वीराज का नाजायज पुत्र) जो तारागढ़ किले में रह गया था, जागीरदार राजा के रूप में स्थापित कर दिया गया। अजमेर का मामला सुलझने के बाद गोरी ने दिल्ली की ओर रुख किया और लाल कोट किले को घेर लिया। १७ मार्च 1192 को तोमर सेना ने विशाल घुरिद सेना का प्रतिरोध किया और मई 1193 के आसपास बहुत लंबी घेराबंदी के बाद किले पर कब्जा कर लिया गया और शांतिपूर्वक खाली करवा दिया गया। ऐबक ने चुपके से तेजपाल २ का पीछा किया और मौका पाकर उस पर हमला कर दिया और उसका सिर काटकर लाल कोट के गेट पर लटका दिया। दूसरी ओर चूंकि बचे हुए शाही परिवार के सदस्य संख्या में बहुत कम थे, भौगोलिक रूप से मुस्लिम साम्राज्य के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में सीमित रह गए थे और स्थानीय आबादी से शादी नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने करेवा या विधवा पुनर्विवाह की प्रथा शुरू करने का फैसला किया और इसलिए बाकी राजपूतों से अलग हो गए (जिनके बीच विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध था)। राजाओं के इस समूह को अन्य राजपूतों द्वारा करेवा का पालन करने वाले के रूप में संदर्भित किया जाने लगा और समय के साथ यह करेवा - रेवा और फिर अंत में रवा में बदल गया। समय के साथ, उन्होंने गंगा नदी के दोनों किनारों पर (बिजनौर, मुजफ्फरनगर और मेरठ जिलों में) नए गांवों की स्थापना की। कुछ राजपूत जो बाद में मेरठ मुजफ्फरनगर क्षेत्र में गए (जैसे चंद्रसेन कुशवाहा) और रवा गांवों के पास गांवों की स्थापना की, रवा के साथ शादी करने का फैसला किया तो उन्हे भी रवा राजपूत कहा जाने लगा। 1601 में, कुछ माल्हयाण तोमरों ने मुगलपुरा (वर्तमान आर्यपुरा सब्जी मंडी) और वजीरपुर जैसे मुस्लिम स्थापित गांवों में रहने का फैसला किया। जब शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया, तो कई रवों ने अपनी पैतृक भूमि पर वापस जाने का फैसला किया। कुछ चौहान दिल्ली में तब आए जब लाल किला 1638 के आसपास बन रहा था। उन्होंने खामपुर गांव की स्थापना की जो एक सदी तक लगभग 50 चौहान परिवारों का समूह बना रहा। बाद में जब रवा राजपूतों की काफी आबादी दिल्ली लौट आई‌ तो उन्हें नारायणगढ़ किले में रहने वाले मेव मुसलमानों के कुकर्मों के बारे में पता चला। रवों ने किले पर हमला किया और मेव मुसलमानों से कब्जा कर लिया। मेव मुसलमानों ने जाकर शाहजहाँ से मदद मांगी। मुगल बादशाह ने रया रियासत के गोपालदास राठौर को मामले की देखरेख के लिए भेजा। नारायणगढ़ पहुंचने पर, उन्हें पता चला कि किला वास्तव में रवा के पूर्वजों का ही था, जो उनकी अनुपस्थिति में मेव मुसलमानों द्वारा कब्जा कर लिया गया था। गोपालदास राठौर ने सच्चाई जानने के बाद शब्दों का खेल खेलने का फैसला किया। इसके बाद गोपालदास शाहजहाँ के दरबार में गए और उनसे कहा "अब नारायणगढ़ किला रया सरदारों की देखरेख में है"। यही वह पर्स्थिति थी जिसमें नारायणगढ़ किले के विजेता, दिल्ली के रवा, आगे किसी भी प्रकार की अशांति से बचने के लिए खुद को रवा के बजाय रया के रूप में संदर्भित करने लगे। रवों ने समय के साथ विभिन्न कारणों से किले से बाहर निकलने का विकल्प चुना और निम्नलिखित क्रम में 4 गांवों की स्थापना की - मादीपुर, बसई, ततारपुर और नांगल। जैसे-जैसे किले की स्थिति और बिगड़ती गई, रवा परिवारों ने अंततः किले को पूरी तरह से छोड़ने का फैसला किया और पहाड़ी किले से सटे मैदानों में ही नारायणा के नाम से एक गाँव की स्थापना की।


कुछ विशेष बातें जो उपर्युक्त इतिहास का समर्थन करती हैं :
• अब गौरवा नाम के एक समुदाय का भी उल्लेख करना चाहिए। वे कुछ चौहान राजपूत थे और उन्होंने भी रवा राजपूतों के बाद विधवा पुनर्विवाह या करेवा शुरू किया और इसलिए राजपूतों से अलग हो गए। गौरवा समुदाय के नाम से ही पता चलता है कि उन्होंने करेवा किया होगा क्योंकि उनके नाम में 'रवा' शब्द है।
गौरवा और रवा में अंतर यह है कि एक भी रवा कभी इस्लाम में परिवर्तित नहीं हुआ, जबकि कई मुस्लिम गौरवा भी हैं।
दूसरा अंतर यह है कि रवा 6 अलग-अलग कुलों का एक समूह है और गौरवा केवल चौहान कुल के थे।
• रवा उन राजाओं के वंशज हैं जो बहुत कम संख्या में थे और मेरठ मुजफ्फरनगर क्षेत्र में शासन कर रहे थे। यही कारण है कि हमारी जनसंख्या अन्य समुदायों की तुलना में बहुत कम है।
• कोई भी इतिहास रिकॉर्ड यह बताने में सक्षम नहीं था कि पृथ्वीराज चौहान की पत्नियों और बच्चों का क्या हुआ, जबकि रवा राजपूत चौहान पृथ्वीराज चौहान के वंशज होने का दावा करते हैं। इसी तरह युद्ध में मारे गए राजाओं की पत्नियों और बच्चों का क्या हुआ क्योंकि जौहर का भी कोई रिकॉर्ड नहीं है।
• कई राजपूत वंश जो रवा समुदाय का हिस्सा हैं, चौहानों के सामंती शासक थे और उन्होंने निश्चित रूप से तराइन की लड़ाई में भाग लिया था:
अहाड़ गहलोत, भदानक यादव, दिल्ली तोमर, कलानौर परमार

• अगर हम बिरादरी में किसी से पूछते हैं कि उन्हें रया नाम कैसे मिला, तो वह बस यह प्रचलित वाक्य कहते हैं - "अरे महाराज, हम तो आपकी रया है" जो परोक्ष रूप से इस कहानी को सही साबित करता है।
• रवा और अन्य राजपूतों में करेवा को‌ लेकर मतभेद होने के ‌कारण ही हम बिजनौर के रवा और वर्ष 1557 में बिजनौर स्थानांतरित हुए राजपूतों के बीच किसी भी विवाह के बारे में नहीं सुनते हैं।
• हमारे समुदाय की अधिकांश आबादी तोमर (तंवर) है क्योंकि युद्ध में भाग लेने वाले अधिकांश राजा चाहड़पाल तोमर के कुल के सदस्य थे।
• दिल्ली में गांवों की संख्या यूपी के गांवों की तुलना में बहुत कम है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हमारे समुदाय का अधिकांश हिस्सा उत्तर प्रदेश में रहता था और बाद में कुछ लोग दिल्ली चले गए।

• हमारे समुदाय में कुछ गोत्र हैं जो तराइन की लड़ाई (1192) की तारीख के आसपास जीवित राजाओं के नाम पर बने थे :
पृथ्वीराज चौहान के पुत्र
राजा भोज के छोटे भाई के परपोते
बयाना के विजयपाल यादव के परपोते
राजा जस के पुत्र पातल ने 1188 में राजा जस के सठेरी चले जाने के बाद पातलान गोत्र की शुरुआत की।

• भाटों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुछ रवा राजपूत गांवों की स्थापना की तारीख 1192 के करीब या उसके ठोड़े बाद की है :
अनंगपाल 2 के परपोते ज्वालाहेड़ी से टटीरी इसी के आसपास गए थे।
राजा जस 1188 ईस्वी (संवत 1245) में सठेड़ी गए थे।
उखलीना गांव की तारीख 1360 है।
सुजरा गांव की तारीख 1388 (संवत 1445) है।

• जाट सर्व खाप पंचायत इतिहास में भी रवा राजपूतों के कई उल्लेख हैं जैसे - रवो‌ ने तैमूर आक्रमण का प्रतिरोध किया था, रवो ने 1857 में अंग्रेजों के खात्मे के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था, आदि।

हमारे समुदाय के कई लोगों ने बिरादरी इतिहास लिखा है और नीचे उन सभी की गलतियां बताई गई है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप पहले उनके द्वारा लिखे गए इतिहास को पढ़ें और फिर इन बिंदुओं को ठीक से समझे -
• राम सिंह रावत और राजपूत वाहिनी दल की कहानी - जयपाल तोमर की महमूद गजनवी के खिलाफ बटालियन बनाने की कहानी सच नहीं है। दरअसल महमूद गजनवी के खिलाफ हिंदू शाही वंश के जयपाल शाही ने एक बटालियन (पहला गठबंधन) बनाया था। भ्रम इसलिए पैदा हुआ क्योंकि दोनों राजाओं का पहला नाम एक ही था। जयपाल शाही के बेटे ने दूसरा गठबंधन बनाया। हरिहर निवास द्विवेदी की तोमर ऑफ दिल्ली बुक में उल्लेख किया गया है कि जब जयपाल तोमर ने गठबंधन का आह्वान किया, तो पिछले दो गठबंधनों की विफलता के कारण सभी राजा पहले से ही नाखुश थे और इसलिए कोई भी उनके गठबंधन में शामिल होने के लिए नहीं आया। जयपाल तोमर के पुत्र कुमारपाल तोमर ने 1043 में तीसरा गठबंधन बनाया। लेकिन उसे भी कोई नाम नहीं दिया गया। इस कहानी के अनुसार राजपूत वाहिनी दल रावाद और फिर रवा में परिवर्तित हो गया, लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है और ऐसा लगता है कि यह इतिहास रवा इतिहास को महिमामंडित करने के लिए लिखा गया था।
• हेमेंद्र कुमार और पुरुरवा की कहानी - एक कथा है कि रवा शब्द पुरुरवा से आया है जो चंद्रवंशी राजपूतों के पूर्वज थे। लेकिन फिर अन्य सूर्यवंशी और अग्निवंशी राजपूत रवा शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं।
• नेमपाल सिंह और नारायणगढ़ की कहानी - नेमपाल सिंह आर्य ने हमारी बिरादरी का एक इतिहास प्रकाशित किया था और उस इतिहास में हमारे पूर्वजों के नाम और हमारे गोत्रों की उत्पत्ति बिल्कुल सही है। लेकिन उसमें कुछ कमीं हैं| मेव मुसलमानों से नारायणगढ़ किला जीतने वाले रवा राजपूतों की कहानी शायद सच हो सकती है। लेकिन उनके अनुसार उन्होंने पहले रया को स्वीकार किया और फिर यह रवा में बदल गया क्योंकि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण नया को नवा बोलते हैं। मैं यह उल्लेख करना चाहता हूं कि दिल्ली के रवा राजपूत भी ग्रामीण थे और यहां तक ​​कि वह भी नया को नवा कहते थे, फिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। दूसरी बात, मैं मानता हूं कि दिल्ली में रहने वाले हमारे लोगों को शाहजहां के डर से रया शब्द को स्वीकार करना पड़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश में रहने वाले हमारे लोगों ने उस शब्द को क्यों स्वीकार किया। उन्हें शाहजहाँ से कोई खतरा नहीं था और वे केवल राजपूत कहलाना पसंद करते।
साथ ही शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान राव नारायणपाल सिंह की 9वीं पीढ़ी को जीवित रहने के लिए प्रत्येक राजा को कम से कम 60 वर्ष देना होगा जो पूरी तरह से असंभव है। मध्यकालीन भारत में राजाओं के शासन इतने लंबे समय तक नहीं रहे, क्योंकि वे विभिन्न युद्ध लड़ते थे। एक आखिरी बात यह है कि अगर रवा शब्द की उत्पत्ति १७वीं सदी में हुई है तो सर्व खाप पंचायत इतिहास की किताब में १४वीं सदी से भी पहले रवा समुदाय के नेताओं के नामों का जिक्र कैसे हो गया।

यह लेख पिछले‌ सभी बिरादरी इतिहासों और कुछ भाटों की बही के विस्तृत विश्लेषण के बाद लिखा गया है। इसके अन्य स्रोत हैं हरिहर निवास द्विवेदी की दिल्ली के तोमर व विलियम क्रुक की उत्तर पश्चिमी प्रांतों और अवध की जनजातियाँ और जातियाॅं किताबें।
लेखक - राघव‌ सिंह
(गाॅंव सूजरा, सुपुत्र श्री घनश्याम सिंह, पौत्र स्वर्गीय श्री रामकिशन)
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